विपिन चौहान "मन"

Tuesday, October 30, 2007

Posted by विपिन चौहान "मन" at 2:47 AM

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विपिन चौहान "मन"
अब आफताब की किरणों में रोशनी न रही.. ये जिन्दगी भी बिना तेरे जिन्दगी न रही.. बस एक तुमको नही पाया तो रंज लगता है.. यूँ मेरे पास किसी चीज की कमी न रही.. मैं तुमसे दूर हूँ जिन्दा हूँ शर्म भी है मुझे.. गुनाह ये है कि आसान खुदखुसी न रही.. "तुम क्या जानो क्या गुजरी है उस के सीने पर.. जिस माहताब के साये में चांदनी न रही.... विपिन चौहान "मन"
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